महंगाई- कहाँ जाएँ हम
एक टीवी चैनल के अनुसार बहूत सांसदों को रोजमर्रा की चीजों के दाम मालूम नहीं होता| उन्हें क्या जरूरत आलू प्याज के दाम से? पर वे संसद को चलने से रोक सकते है इसी बिषय पर |
पर उनकी बात छोडिये, कुछ दिनों पहले मैं चकित हुआ एक दिन टमाटर को ५० रुपये किलो बिकता पाकर| आज आश्चर्य तब हुआ जब खीरे का दाम ५० रुपये किलो सुना सबेरे की खरीददारी में | आश्चर्य, सरकार और प्रधान मंत्री महंगाई की बात मानते नहीं|
हमारी तरह के पुराने बिचार के लोगों को महँगी चीजों का बहिष्कार करना एक तरीका लगता है, शायद नई पीढी नहीं माने | पर सोचता हूँ यह अपने देश में हीं क्यों होता है| यह सप्लाई की कमी के ही कारण नहीं होता|
पर उससे भी खतरनाक बात आज भारत के स्वास्थ्य मंत्री ने बताई है| सब्जी उगाने और दूध के उत्पादन में ऑक्सीटोसिन का उपयोग इंजेक्सन के द्वारा, जो आदमी के शरीर के लिए बहूत नुकशान करने वाला होता है| यह उत्पादन और वजन बढ़ाने के लिए किया जा रहा है|
एक और बात - कल तक जानता था घी नकली बनता है, मेवा नकली और खतरनाक हो सकता है| सोचा था पेठा खाकर ही मीठा का काम चला लिया जायेगा| पर कल देखा पेठा बनाने में काफी रसायन का ब्यवहार किया जाता है और स्वास्थ्य के लिए बहूत खतनाक हो सकता है |
अब हम कैसे जाने किस खाने की चीज में रसायन का उपयोग हुआ है और उसे हम नहीं खरीदें|
पर जरूरी है यह सोचना कि क्या निदान है इसका? कौन जिम्मेदार है इस खतरनाक मानसिकता का, जिसमे अपने कुछ फायदे के लिए हम कोई भी गलत तरीका अपना लेते हैं|
क्या किसानों को पता है कि वे कितना खतरनाक काम कर रहें हैं| शायद अगर उन्हें अपनी गलती की जानकारी होती तो वे यह रास्ता नहीं अपनाते|
और अगर येसे बात नहीं बनती हो तो फिर दंड|